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अपने को उभार ले बस अब वक़्त हैं तेरा (कविता)

यह कविता उन सभी की लिए जो कही ना कही अपने ज़िन्दगी में रुक गए हैं। शायद ज़िम्मेदारियों के बोझ तले या समाज के दायरे में फसे। बस अब यही कहूंगी बढ़े चलो बढ़े चलो कौन कहता हैं दिल को समेट लो ख्वाइशें और भी हैं दिल में इनको भी उभरने दो किरदार बहुत निभा लिए… Read More अपने को उभार ले बस अब वक़्त हैं तेरा (कविता)